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मीरा चरित (25) || राधेकृष्णावर्ल्ड 9891158197|| #srbhshrmrkw

राधेकृष्णावर्ल्ड 9891158197 #srbhshrmrkw मीरा चरित (25) क्रमशः से आगे ........... मेड़ता से गये पुरोहित जी के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित और उनकी पत्नी मीरा को देखने आये ।राजमहल में उनका आतिथ्य सत्कार हो रहा है ।पर मीरा को तो जैसे वह सब दीखकर भी दिखाई नहीं दे रहा है ।उसे न तो कोई रूचि है न ही कोई आकर्षण । दूसरे दिन माँ सुन्दर वस्त्राभूषण लेकर एक दासी के साथ मीरा के पास आई ।आग्रह से स्थिति समझाते हुये मीरा को सब पहनने को कहा । मीरा ने बेमन से कहा ,"आज जी ठीक नहीं है , भाबू ! रहने दीजिये , किसी और दिन पहन लूँगी ।" माँ खिन्न हो कर उठकर चली गई ।तो मीरा ने उदास मन से तानपुरा उठाया और गाने लगी ....... राम नाम मेरे मन बसियो रसियो राम रिझाऊँ ए माय । ................................. मीरा के प्रभु गिरधर नागर रज चरणन की पाऊँ ए माय ॥ भजन विश्राम कर वह उठी ही थी कि माँ और काकीसा के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित जी की पत्नी ने श्याम कुन्ज में प्रवेश किया ।मीरा उनको यथायोग्य प्रणाम कर बड़े संकोच के साथ एक ओर हटकर ठाकुर जी को निहारती हुईं खड़ी हो गई । पुरोहितानी जी  ने तो ऐसे रूप की कल्...

मीरा चरित (24)||राधेकृष्णावर्ल्ड 9891158197 ||

राधेकृष्णावर्ल्ड 9891158197 #srbhshrmrkw मीरा चरित (24) क्रमशः से आगे ............... भोजराज श्याम कुन्ज से प्रतिज्ञा कर अपने डेरे लौट आये ।वहाँ आकर कटे वृक्ष की भाँति पलंग पर जा पड़े ।पर चैन नहीं पड़ रहा था ।कमर में बंधी कटार चुभी , तो म्यान से बाहर निकाल धार देखते हुये अनायास ही अपने वक्ष पर तान ली  ....... । एक क्षण........  में ही लगा जैसे बिजली चमकी हो ।अंतर में मीरा आ खड़ी हुईं ।उदास मुख , कमल- पत्र पर ठहरे ओस-कण से आँसू गालों पर चमक रहे है ।जलहीन मत्स्या (मछली ) सी आकुल दृष्टि मानो कह रही हो - आप ऐसा करेंगे -तो मेरा क्या होगा ? भोजराज ने तड़पकर कटार दूर फैंक दी ।मेवाड़ का उत्तराधिकारी , लाखों वीरों का अग्रणी, जिसका नाम सुनकर ही शत्रुओं के प्राण सूख जाते है और दीन -दुखी श्रद्धा से जयजयकार कर उठते है ,जिसे देख माँ की आँखों में सौ- सौ सपने तैर उठते है ......वही मेदपाट का भावी नायक आज घायल शूर की भाँति धरा पर पड़ा है ।आशा -अभिलाषा और यौवन की मानों अर्थी उठ गई हो ।उनका धीर -वीर ह्रदय प्रेम पीड़ा से कराह उठा ।उन्हें इस दुख में भाग बाँटने वाला कोई दिखाई नहीं देता...

Mera aapki kripa se sab kaam ho raha hai bhakti status , Kanhaiya whats ...

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देवशयनी एकादशी || RADHEY KRISHNA WORLD9891158197|| AAJ KI TITHI

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राधेकृष्णावर्ल्ड 9891158197 देवशयनी एकादशी  Chaturmas 2020: देवशयनी एकादशी 1 जुलाई को है. इस दिन से चातुर्मास शुरू हो रहे हैं. चातुर्मास में भगवान विष्णु विश्राम करने के लिए पाताल लोक यानि क्षीरसागर स्थिति अपने शयन में चलें जाएंगे. इस दौरान सृष्टि की कमान भगवान शिव के हाथों में रहेगी. देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु का विश्राम काल आरंभ हो रहा है. इस दिन से ही चार्तुमास आरंभ हो जाएंगे. इस बार चार्तुमास 148 दिनों का है. जो 25 नवंबर को देवोत्थानी एकादशी को समाप्त होगा. इस दिन भगवान विष्णु अपने शयन कक्ष से बाहर आ जाएंगे. इस बार अधिकमास यानि मलमास भी है. मान्यता है कि जिस वर्ष 24 एकादशी के स्थान पर 26 एकादशी होती हैं तो चार्तुमास अधिक लंबा होता है. इस कारण इस बार चार्तुमास की अवधि लगभक 5 माह की रहेगी. देवशयनी एकादशी को पद्मनाभा भी कहा जाता है. भगवान शिव देखते हैं धरती का कार्य चार्तुमास आरंभ होते हैं भगवान विष्णु धरती का कार्य भगवान शिव को सौंप देते हैं. भगवान शिव चार्तुमास में धरती के सभी कार्य देखते हैं. इसीलिए चार्तुमास में भगवान शिव की उपासना को विशेष महत्...

! श्रीराधाचरितामृत" - भाग 2 |radhey krishna world| 9891158197

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RADHEY KRISHNA WORLD9891158197 !! श्रीराधाचरितामृत" - भाग 2 !! "जय हो जगत्पावन प्रेम कि .....जय हो उस अनिर्वचनीय प्रेम कि ..... उस प्रेम कि जय हो, जिसे पाकर कुछ पानें कि कामना नही रह जाती । उस 'चाह" कि जय हो .........जिस "प्रेम चाह" से कामनारूपी पिशाचिनी का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है .......। और अंत में हे यादवकुल के वंश धर वज्रनाभ ! तुम जैसे प्रेमी कि भी जय हो ........जय हो । महर्षि शाण्डिल्य से "श्रीराधाचरित्र" सुननें कि इच्छा प्रकट करनें पर ......महर्षि के आनन्द का ठिकाना नही रहा ...वो उस प्रेम सिन्धु में डूबनें और उबरनें लगे थे । हे द्वारकेश के प्रपौत्र ! मैं क्या कह पाउँगा श्रीराधा चरित्र को ? जिन श्रीराधा का नाम लेते हुए श्रीशुकदेव जैसे परमहंस को समाधि लग जाती है ...........वो कुछ बोल नही पाते हैं । हाँ ......प्रेम अनुभूति का विषय है वज्रनाभ ! ये वाणी का विषय नही है .........कुछ देर मौन होकर फिर हँसते हुए बोलना प्रारम्भ करते हैं महर्षि शाण्डिल्य ............हा हा हा हा.........गूँगे के स्वाद कि तरह है ये प्रेम .......

भगवान शिब के बारे मे आपको सबसे अच्छी बात क्या लगती है?| RADHEY KRISHNA WORLD 9891158197

Radhey krishna world 9891158197 प्रश्न - भगवान शिब के बारे मे आपको सबसे अच्छी बात क्या लगती है? जवाब - वह महादेव, जिनकी दृष्टि मे देव, दानव और मानव सभी समान है। जिन्होंने कमल और धतूरे मे, भस्म एवं चंदन मे कभी अंतर नहीं किया । सादा जीवन उच्च विचार वाला सिद्धांत भी शिव से ही शुरू हुआ था । वस्त्रों के स्थान पर कुछ पहनने का मन हुआ तो बाघ - तेंदुए की खाल पहन ली। रहने के लिए बहुत से स्थान है जैसे - कैलाश, काशी, श्मशान एवं वन । ऐसा कोई देवता बता दो, जो केवल एक बेलपत्र या थोड़े से जल से प्रसन्न हो जाते हो । जिन्हें किसी कठिन व्रत, नियम, अनुष्ठान आदि की आवश्यकता न हो । प्रभु शिव सरलता की पराकाष्ठा हैं । दिखावा पसंद नहीं करते, वरना आप ही बताइए कि अपनी ही बारात मे बैल पर सवार होकर, बाघ की खाल, नाग एवं मुंडमाला पहने, भस्म लगाए हुए देवों एवं मुनियों के साथ भूत पिशाच को बाराती बनाकर कौन आ सकता हैं । अपनी ही पत्नी के सामने कतार लगाकर, विनम्र भाव से अन्न की भिक्षा मांगकर अपने भक्तों को भोजन परोसने वाले देवता शायद ही कभी देखें गए हो । एक पति जिसने अपनी पत्नी के सम्...

"श्रीराधाचरितामृत" 1|| radhey krishna world 9891158197

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RADHEY KRISHNA WORLD 9891158197 "श्रीराधाचरितामृत" - भाग 1 ओह ! ये क्या ! ये बृज है ? ये मेरे भगवान श्रीकृष्ण का बृज ? करील के काँटे ! ये भी सूख गए हैं......यहाँ कोई भी तो नही है । क्या क्या सोचकर चले थे द्वारिका से ये वज्रनाभ ..बृज की ओर । .ये वज्रनाभ श्रीकृष्ण के प्रपौत्र हैं .....हाँ हाँ द्वारकेश श्रीकृष्ण के । सब नष्ट हो गया द्वारिका में तो ........यदुवंशी आपस में ही लड़ भिड़ कर मर रहे थे ........जब उनके पास कोई अस्त्र न बचा तो उठा लिया था सबों नें उस नुकीले घास को .......जो समुद्र के किनारे थे । ओह ! कितना भीषण युद्ध था आपस में ही .......सब मर रहे थे ....और उधर समुद्र में सुनामी आरही थी .....द्वारिका टेढ़ा हो रहा था । चारों ओर मृत शरीर पड़े थे यदुवंशियों के .........पर उसी समय ये बात जब सुनी श्रीकृष्ण की रानियों नें.........कि श्रीकृष्ण के चरणों में किसी व्याधा नें बाण मार दिया और श्रीकृष्ण चले गए अपनें धाम ....। महारानी रुक्मणि सहित अष्टपटरानियों नें अपनें देह तुरन्त त्याग दिए । सौ रानियों के प्राण विरह से निकल गए ............... अब बची थीं ....