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! श्रीराधाचरितामृत" - भाग 2 |radhey krishna world| 9891158197

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RADHEY KRISHNA WORLD9891158197 !! श्रीराधाचरितामृत" - भाग 2 !! "जय हो जगत्पावन प्रेम कि .....जय हो उस अनिर्वचनीय प्रेम कि ..... उस प्रेम कि जय हो, जिसे पाकर कुछ पानें कि कामना नही रह जाती । उस 'चाह" कि जय हो .........जिस "प्रेम चाह" से कामनारूपी पिशाचिनी का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है .......। और अंत में हे यादवकुल के वंश धर वज्रनाभ ! तुम जैसे प्रेमी कि भी जय हो ........जय हो । महर्षि शाण्डिल्य से "श्रीराधाचरित्र" सुननें कि इच्छा प्रकट करनें पर ......महर्षि के आनन्द का ठिकाना नही रहा ...वो उस प्रेम सिन्धु में डूबनें और उबरनें लगे थे । हे द्वारकेश के प्रपौत्र ! मैं क्या कह पाउँगा श्रीराधा चरित्र को ? जिन श्रीराधा का नाम लेते हुए श्रीशुकदेव जैसे परमहंस को समाधि लग जाती है ...........वो कुछ बोल नही पाते हैं । हाँ ......प्रेम अनुभूति का विषय है वज्रनाभ ! ये वाणी का विषय नही है .........कुछ देर मौन होकर फिर हँसते हुए बोलना प्रारम्भ करते हैं महर्षि शाण्डिल्य ............हा हा हा हा.........गूँगे के स्वाद कि तरह है ये प्रेम .......

"श्रीराधाचरितामृत" 1|| radhey krishna world 9891158197

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RADHEY KRISHNA WORLD 9891158197 "श्रीराधाचरितामृत" - भाग 1 ओह ! ये क्या ! ये बृज है ? ये मेरे भगवान श्रीकृष्ण का बृज ? करील के काँटे ! ये भी सूख गए हैं......यहाँ कोई भी तो नही है । क्या क्या सोचकर चले थे द्वारिका से ये वज्रनाभ ..बृज की ओर । .ये वज्रनाभ श्रीकृष्ण के प्रपौत्र हैं .....हाँ हाँ द्वारकेश श्रीकृष्ण के । सब नष्ट हो गया द्वारिका में तो ........यदुवंशी आपस में ही लड़ भिड़ कर मर रहे थे ........जब उनके पास कोई अस्त्र न बचा तो उठा लिया था सबों नें उस नुकीले घास को .......जो समुद्र के किनारे थे । ओह ! कितना भीषण युद्ध था आपस में ही .......सब मर रहे थे ....और उधर समुद्र में सुनामी आरही थी .....द्वारिका टेढ़ा हो रहा था । चारों ओर मृत शरीर पड़े थे यदुवंशियों के .........पर उसी समय ये बात जब सुनी श्रीकृष्ण की रानियों नें.........कि श्रीकृष्ण के चरणों में किसी व्याधा नें बाण मार दिया और श्रीकृष्ण चले गए अपनें धाम ....। महारानी रुक्मणि सहित अष्टपटरानियों नें अपनें देह तुरन्त त्याग दिए । सौ रानियों के प्राण विरह से निकल गए ............... अब बची थीं ....