! श्रीराधाचरितामृत" - भाग 2 |radhey krishna world| 9891158197
RADHEY KRISHNA WORLD9891158197 !! श्रीराधाचरितामृत" - भाग 2 !! "जय हो जगत्पावन प्रेम कि .....जय हो उस अनिर्वचनीय प्रेम कि ..... उस प्रेम कि जय हो, जिसे पाकर कुछ पानें कि कामना नही रह जाती । उस 'चाह" कि जय हो .........जिस "प्रेम चाह" से कामनारूपी पिशाचिनी का पूर्ण रूप से नाश हो जाता है .......। और अंत में हे यादवकुल के वंश धर वज्रनाभ ! तुम जैसे प्रेमी कि भी जय हो ........जय हो । महर्षि शाण्डिल्य से "श्रीराधाचरित्र" सुननें कि इच्छा प्रकट करनें पर ......महर्षि के आनन्द का ठिकाना नही रहा ...वो उस प्रेम सिन्धु में डूबनें और उबरनें लगे थे । हे द्वारकेश के प्रपौत्र ! मैं क्या कह पाउँगा श्रीराधा चरित्र को ? जिन श्रीराधा का नाम लेते हुए श्रीशुकदेव जैसे परमहंस को समाधि लग जाती है ...........वो कुछ बोल नही पाते हैं । हाँ ......प्रेम अनुभूति का विषय है वज्रनाभ ! ये वाणी का विषय नही है .........कुछ देर मौन होकर फिर हँसते हुए बोलना प्रारम्भ करते हैं महर्षि शाण्डिल्य ............हा हा हा हा.........गूँगे के स्वाद कि तरह है ये प्रेम .......