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केदार नाथ धाम से जुड़े रहस्य || radhey krishna world 9891158197

राधे कृष्णा वर्ल्ड 9891158197 #SRBHSHRMRKW   *केदार नाथ धाम से जुड़े रहस्य*  १. माना जाता है की 400 साल तक बर्फ में दबा रहा केदारनाथ धाम। २. 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सर्वोच्च ज्योतिर्लिंग मंदिर। ३. केदार, खर्चकुंड और भरतकुंड 3 पहाड़ी व 5 नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी अविरल बहती हैं। ४. 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़े 85 फुट ऊंचे, 187 फुट लंबे और 80 फुट चौड़े मंदिर की दीवारें 12 फुट मोटी हैं जोकि आज भी भवनिकी का नायब नमूना है। ५. माना जाता है की सर्वप्रथम पांडवों ने ब्रह्म हत्या से मुक्ति पाने के लिए बनवाया था केदार नाथ मंदिर, इसके बाद आदि गुरु शंकराचार्य ने इसकी पुनर्स्थापना की ।इसका गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन है जिसे 8वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है। पहले 10वीं सदी में मालवा के राजा भोज द्वारा और फिर 13वीं सदी में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। ६. 6 माह तक मंदिर के अंदर दीपक जलता रहता है केदार धाम के कपाट शीत ऋतु में बंद होते है जब पुन कपाट खोले जाते हैं तो ६ माह पूर्व जलाये दीये में ज्योति...

KAMKHAYA MANDIR KI KAHANI RADHEY KRISHNA WORLD SRBHSHRM 9891158197

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राधेकृष्णावर्ल्ड 9891158197  TEMPLE STORY 4 कामाख्या मंदिर की पूरी कहानी प्रचलित कथा के अनुसार देवी सति ने भगवान शिव से शादी की. इस शादी से सति के पिता राजा दक्ष खुश नहीं थे. एक बार राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया लेकिन इसमें सति के पति भगवान शिव को नहीं बुलाया.असम के गुवाहाटी से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है देवी सती का कामाख्या मंदिर. इस मंदिर को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं. लेकिन 51 शक्तिपीठों में से सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाला यह मंदिर रजस्वला माता की वजह से ज़्यादा ध्यान आकर्षित करता है. यहां चट्टान के रूप में बनी योनि से रक्त निकलता है.  देवी सति ने भगवान शिव से शादी की. इस शादी से सति के पिता राजा दक्ष खुश नहीं थे. एक बार राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया लेकिन इसमें सति के पति भगवान शिव को नहीं बुलाया. सति इस बात से नाराज़ हुईं और बिना बुलाए अपने पिता के घर पहुंच गई. इस बात पर राजा दक्ष ने उनका और उनके पति का बहुत अपमान किया. अपने पति का अपमान उनसे सहा नहीं गया और हवन कुंड में कूद गई.इस बात का पता चलते ही भगवान शिव भी यज्ञ में पहुंचे और सति का...

Radha govind dev ji temple, Jaipur

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Radhey krishna World 9891158197 RadhaGovind Dev Ji, Jaipur temple. राधागोविंद देव जी, जयपुर ठाकुर श्री गोविन्ददेवजी महाराज के वर्तमान मंदिर परिसर में विराजमान होते ही जैसे जयपुर का भाग्य उदय हो गया इसके पश्चात ही इनके अनुपम अलौकिक वरद हस्त के संरक्षण में18 नवम्बर सन 1727 को गंगापोल पर जयपुर की नींव का पत्थर लगाया गया। दीवान विद्याधर और नंदराम मिस्त्री द्वारा वास्तु और अंक ज्योतिष पर आधारित योजना के अनुसार सवाई जयसिंह द्वितीय ने इस शहर को बसाकर तैयार कर दिया। मंदिर मे तो गोविंद देव जी देखने को ही विराजित है असल मे बसते तो ये जयपुर के लोगों की सांसों में हैं ! ठाकुर जी इन भक्तों के सर्वश है .. अपनी आस्था और विश्वास के इन स्रोत के लिये जयपुर वासियों का हृदय सहज ही पुकार उठता है : त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या दविणं त्वमेव, त्वमेव सर्व मम देव देव ।। इन अहैतु के कृपा सरोवर से भक्ति की एक स्वर्गिक गंगा बह चली, वृन्दावन मानो जयपुर में जीवित हो उठा..! मंदिर का इतिहास गोविन्द देव जी मंद...

barsana , mathura ,vrindavan barsana ka maan garh radhey krishna world

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RADHEY KRISHNA WORLD: 9891158197 बरसाने का मानगढ़           यहाँ रूठी हुई राधा रानी को श्याम सुन्दर ने मनाया था। श्यामसुन्दर ने राधा रानी जी को मनाने के बहुत से उपाए किये। कभी उनके चरणों में मस्तक रखते हैं, कभी उनको पंखा करते हैं कभी दर्पण दिखाते हैं और कभी विनती करते हैं। पर जब राधा रानी नहीं मानती हैं तब श्याम सुन्दर सखियों का सहारा लेते हैं। इन्हीं लीलायों के कारण इस स्थली का नाम "मानगढ़" पड़ा। मान माने रूठना, ये मान किसी लड़ाई या क्रोध से नहीं होता है जैसे की संसार में होता है, ये मान एक प्रेम की लीला है। राधा रानी श्याम सुन्दर के सुख हेतु मान करती हैं।         जब श्री जी देखती हैं कि श्याम सुन्दर हमारी प्रेम की आधीनता अधिक चाहते हैं, हमारे चरण स्पर्श चाहते हैं, तब वो मान करती हैं।  मानलीला प्रेम की बहुत ही अद्भुत लीला है जहाँ श्रीजी मान करती हैं। आवत जात हौं हार परी री। ज्यों ज्यों प्यारो विनती कर पठवत,                                 ...

GOVERDHAN JI KI KHATHA.

  RADHEY KRISHNA WORLD       श्री गिरिराज धरण की जय        गोवर्धन में उद्धवजी का लताओ से प्रकट होना जब भगवान अपने धाम को चले गए तब एक दिन भगवान श्रीकृष्ण की विरह-वेदना से व्याकुल सोलह हजार रानियाँ अपने प्रियतम पतिदेव की चतुर्थ पटरानी यमुना जी को आनंदित देखकर सरलभाव से उनसे पूछने लगी. रानियों ने कहा - बहिन कालिंदी ! हमारी तरह तुम भी श्रीकृष्ण की पत्नी हो, हम तो विरहाग्नि में जली जा रही है, किन्तु तुम्हारी यह स्थिति नहीं है. तुम प्रसन्न हो, इसका क्या कारण है? यमुना जी ने कहा - अपनी आत्मा में ही रमण करने के कारण भगवान श्रीकृष्ण आत्माराम है और उनकी आत्मा है -श्रीराधा जी ! मै दासी की भांति राधाजी की सेवा करती रहती हूँ उनकी सेवा का ही यह प्रभाव है कि विरह हमारा स्पर्श नहीं कर सकता. भगवान श्रीकृष्ण की जितनी भी रानियाँ है सब की सब श्री राधा जी के ही अंश का विस्तार है.राधा कृष्ण एक है.उनका परस्पर संयोग है और उन दोनों का प्रेम ही वंशी है. तुम सब का भी श्री कृष्ण के साथ वियोग नहीं हुआ है.किन्तु तुम इस रहस्य को इस रूप में नहीं जानती हो इसलिए...