क्या सच में रास रचाने आते हैं रात में राधाकृष्ण

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निधिवन का रहस्य!
*क्या सच में रास रचाने आते हैं रात में राधाकृष्ण?*
कहा जाता है कि निधिवन की समस्त लतायें गोपियाँ हैं, जो एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले खड़ी हैं। जब रात में निधिवन में राधा रानी जी, बिहारी जी के साथ रास लीला करती हैं तो वहाँ की लतायें गोपियाँ बन जाती हैं और फिर रासलीला आरंभ होती है। इस रास लीला को कोई नहीं देख सकता। दिनभर में हजारों बंदर, पक्षी, जीव-जंतु निधिवन में रहते हैं पर जैसे ही शाम होती है सब जीव-जंतु, बंदर अपने आप निधिवन से चले जाते हैं। एक परिंदा भी वहाँ पर नहीं रुकता। यहाँ तक कि धरती के भीतर के जीव चींटी आदि भी धरती के भीतर चले जाते हैं।
रासलीला को कोई नहीं देख सकता क्योंकि, रासलीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है। रास तो अलौकिक जगत की "परम दिव्यातिदिव्य लीला" है। कोई साधारण व्यक्ति या जीव अपनी आँखों से देख ही नहीं सकता। जो बड़े-बड़े संत हैं उन्हेंने निधिवन से राधारानी जी और गोपियों के नुपुर की ध्वनि सुनी है। जब रास करते-करते राधारानी जी थक जाती हैं तो बिहारी जी उनके चरण दबाते हैं और रात्रि में शयन करते है। शयन के लिए पलंग लगाया जाता है। सुबह बिस्तर को देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया था तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो-ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले निधिवन के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत होती हैं।
निधिवन दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा निधिवन के बारे में जो जानकारी दी जाती है, उसके अनुसार निधिवन में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके।
इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले पशु-पक्षी, बन्दर, भक्त, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है।
उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते हैं वे सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई हैं।
इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि निधिवन में जो 16000 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16000 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही रंग महल में विश्राम करते हैं।
सुबह 5:30 बजे रंग महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई पलंग पर विश्राम करके गया हो। आज भी निधिवन में शयनकक्ष है जहाँ पुजारी जी जल का पात्र, पान, फूल और प्रसाद रखते हैं। जब सुबह पट खोलते हैं तो जल पीया मिलता है, पान चबाया हुआ मिलता है और फूल बिखरे हुए मिलते हैं।
निधिवन परिसर में ही संगीत सम्राट एवं धुपद के जनक श्री स्वामी हरिदास जी की जीवित समाधि, रंग महल, बांके बिहारी जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी चोर आदि दर्शनीय स्थल हैं।
वृन्दावनधाम या बरसाना कोई घूमने-फिरने या पिकनिक मनाने का स्थल नहीं है। ये आपके इष्ट की जन्मभूमि, लीलाभूमि व तपोभूमि है। सबसे विशेष बात ये प्रेमभूमि है। जब भी आओ इसको तपोभूमि समझ कर मानसिक व शारीरिक तप किया करो। तन से सेवा व वाणी से राधा नाम गाया जाए तब ही धाम मे आना सार्थक है। एक अद्भुत मस्ती, शक्ति व आनंद ले कर वापिस जाया करो।
जै जै वृन्दावनधाम

🌷श्रीधाम वृंदावन बांके बिहारी लाल जी की जय।🌷
🌷जय श्री राधे राधे।🌷

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